300 वर्ष पुराना पेड़ के तने में स्थापित अनोखा शिव मंदिर, जहां दर्शन मात्र से मिलती है शांति

हमारे देश की धरती पर ऐसे बहुत से रहस्य छुपे हुए हैं जिनकी अभी तक कोई भी जानकारी नहीं मिल पाई है, इन रहस्यों के आगे विज्ञानिक भी अपने घुटने टेक चुके हैं, हमारे देश भर में ऐसे बहुत से चमत्कारिक मंदिर है जिनके चमत्कार के आगे लोग नतमस्तक हो गए हैं और इन मंदिरों के चमत्कार को सभी लोग नमस्कार करते हैं, आखिर क्यों ना हो? आखिर इन मंदिरों में होने वाले चमत्कार ही ऐसे हैं जिनको देखने के बाद खुद व्यक्ति को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं होता है, इतना ही नहीं बल्कि इन मंदिरों के रहस्य जानने की कोशिश वैज्ञानिकों ने बहुत की है और इन मंदिरों को लेकर उन्होंने कई अध्ययन भी कर चुके हैं परंतु इनमें होने वाले चमत्कार और इनके रहस्य की जानकारी नहीं मिल पाई है।

देशभर में मौजूद इन चमत्कारिक मंदिरों में वर्ष भर भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है, लोगों को इन मंदिरों के चमत्कारों के ऊपर विश्वास भी है, तभी तो वह यह चमत्कार देखने के लिए मंदिरों में जाते हैं, आज हम आपको एक ऐसे अनोखे मंदिर के बारे में जानकारी देने वाले हैं जिसके प्रति लोगों का अटूट विश्वास देखने को मिलता है, इस मंदिर से लोगों की आस्था बहुत है यह लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है, दरअसल, हम जिस अनोखे मंदिर की बात कर रहे हैं यह मंदिर निजामगढ़ में स्थित है, भगवान शिव जी का यह अद्भुत मंदिर जगरामेश्वर नाम से मशहूर है और यह मंदिर बड़ और पीपल के वृक्ष के नीचे बना हुआ है, बड़ और पीपल के वृक्ष के नीचे बना हुआ यह मंदिर बहुत ही अनोखा है, ऐसा बताया जाता है कि वृक्ष के नीचे बना हुआ यह मंदिर लगभग 300 साल पुराना है।

भगवान शिव जी के इस मंदिर में लोग पूजा-पाठ और अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए भारी संख्या में दूर-दूर से आते हैं, दक्षिण भारतीय शैली से बना हुआ यह मंदिर श्रद्धालुओं को अपनी तरफ आकर्षित करता है, इस मंदिर के अंदर भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है, वैसे तो इस मंदिर में वर्ष भर भक्त दूर-दूर से दर्शन के लिए आते हैं लेकिन शिवरात्रि और सावन महीने में इस मंदिर के अंदर भक्तों का भारी तांता लगा रहता है, बड़ और पीपल के वृक्ष का यह बहुत ही अजीबो-गरीब संजोग है यह प्राचीन मंदिर बड़ और पीपल के वृक्ष की जड़ों में बना हुआ है, एक ही स्थान पर बड़ और पीपल का होना लोगों को काफी अचंभित भी करता है, जो भक्त इस मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं उनको इस स्थान पर शांति मिलती है।

इस मंदिर के निर्माण के ऊपर भी एक कथा काफी मशहूर है ऐसा बताया जाता है कि इस मंदिर में एक पुजारी तपस्या में लीन थे जब वह तपस्या कर रहे थे तब उसी समय उनके ऊपर से एक मंदिर गुजरने का आभास हुआ था, पुजारी ने अपनी तपस्या के बल पर उस मंदिर को वहीं पर उतार लिया था और इसको जगराम दुर्ग की पोल के पास स्थापित किया था, ऐसा कहा जाता है कि यह मंदिर पेड़ पर ही उतारा गया था, इसके पश्चात 1765 में इस मंदिर में महादेव की मूर्ति स्थापित की गई थी और इसका नाम जगरामेश्वर रखा गया था, इस मंदिर के अंदर शिव परिवार की स्थापना करवाई गई है, यह मंदिर लगभग 20 से 25 फीट की ऊंचाई पर स्थित है, इस मंदिर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां भी बनवाई गई है, इस पूरे मंदिर का निर्माण दोनों वृक्षों के तने पर करवाया गया है, इस पेड़ की शाखाएं मंदिर की चारों तरफ लिपटी हुई दिखाई देती है, इस मंदिर को लेकर लोगों के मन में बहुत ही विश्वास देखने को मिलता है और यह मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है।

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