वैष्णो देवी के दर्शन करने से पहले जान लें ये जरूरी बात, तभी मिलेगा आपको दर्शन का लाभ

हमारे पूरे भारत देश में बहुत से धार्मिक स्थल मौजूद है और सभी धार्मिक स्थलों की अपनी-अपनी खासियत और विशेषता है, इन्हीं सब धार्मिक स्थलों में से एक वैष्णो माता का धाम हिंदू धर्म में सबसे प्रमुख स्थल माना गया है, माता वैष्णो देवी के दर्शन करने के लिए साल भर भक्तो का तांता लगा रहता है, दूर-दूर से लोग माता वैष्णो देवी के दर्शन करने के लिए आते हैं, माता वैष्णो देवी का मंदिर कटरा से लगभग 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, इस मंदिर की ऊंचाई लगभग 5200 फीट है, हर वर्ष लाखों की संख्या में भक्त माता रानी के दरबार आते हैं, माता रानी के दर्शन के लिए कई घंटों तक लंबी चढ़ाई चढ़नी पड़ती है, उसके बाद जाकर माता के दर्शन होते हैं, ऐसा कहा जाता है कि माता के दर्शन करने के बाद व्यक्ति को सौभाग्य की प्राप्ति होती है, अगर आप भी वैष्णो देवी के दर्शन करने का विचार बना रहे हैं तो उससे पहले आपको कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना बहुत ही आवश्यक है, तभी आपको अपने दर्शन का फल मिल पाएगा।

माता वैष्णो के दर्शन करने के बाद ऐसा बताया जाता है कि इनके दरबार से भक्त जब तक वापस नहीं लौट सकता जब तक वह भैरव बाबा के दर्शन नहीं कर लेता, ऐसा कहा जाता है कि वैष्णो देवी माता के दर्शन करने के पश्चात अगर भक्त भैरव बाबा के दर्शन नहीं करता है तो उसकी यात्रा पूरी नहीं मानी जाती है अर्थात माता के दर्शन करने के बावजूद भी भैरव बाबा के दर्शन ना करने की वजह से दर्शन अधूरा माना जाता है, जो भक्त माता रानी के दर्शन करने के पश्चात भैरव बाबा के दर्शन करते हैं उन भक्तों के ऊपर हमेशा वैष्णो माता की कृपा दृष्टि बनी रहती है।

अब आप लोगों में से कई लोग ऐसे होंगे जिनके मन में यह विचार आ रहा होगा कि आखिर माता के दर्शन करने के पश्चात भैरव बाबा के दर्शन करना क्यों जरूरी है, हम आपको इस विषय में एक प्रचलित पौराणिक कथा के बारे में बताते हैं, जिससे आपको यह पता लग जाएगा कि वैष्णो देवी के दर्शन करने के पश्चात भैरव बाबा का दर्शन करना क्यों जरूरी माना जाता है।

दरअसल, पौराणिक मान्यता के मुताबिक ऐसा बताया जाता है कि एक बार माता वैष्णो देवी के सबसे परम भक्त माने जाने वाले श्रीधर ने नवरात्रि की पूजा की थी और उन्होंने नवरात्रि पूजन के लिए कुंवारी कन्याओं को अपने घर बुलाया था, जब श्रीधर ने कुंवारी कन्याओं को अपने घर बुलाया तब माता रानी भी कन्या का रूप धारण करके उनके घर पहुंच गई थी, माता के परम भक्त श्रीधर ने गांव के सभी लोगों को भंडारे के लिए निमंत्रण दिया था, श्रीधर के निमंत्रण पाने के पश्चात गांव के बहुत से लोग श्रीधर के घर भोजन करने के लिए पहुंचे थे, तब माता रानी कन्या का रूप धारण करके सभी लोगों को भोजन परोसना आरंभ कर दिया था, भोजन परोसते-परोसते जब कन्या भैरवनाथ के पास पहुंची थी तो भैरवनाथ ने भोजन में मांस और मदिरा का सेवन करने की जिद करने लगा था, कन्या ने भैरवनाथ को खूब समझाया परंतु भैरवनाथ ने उसकी एक भी ना सुनी और गुस्से में आकर वह कन्या को पकड़ने का प्रयत्न करने लगा परंतु उससे पहले ही कन्या वायु का रूप लेकर मां चित्रकूट पर्वत की ओर उड़ चली थी।

मां चित्रकूट पर्वत की एक गुफा में माता ने पहुंचकर पूरे 9 महीने तक तपस्या की थी, ऐसा माना जाता है कि उस समय के दौरान महाबली हनुमान जी माता की रक्षा के लिए उनके साथ में ही मौजूद थे, जब भैरवनाथ माता का पीछा करते-करते उस गुफा की तरफ पहुंचा तब माता गुफा के दूसरे छोर से बाहर निकल गई, यह गुफा आज भी अर्धकुमारी या आदिकुमारी के नाम से मशहूर है, गुफा के दूसरे द्वार से बाहर निकलने के पश्चात भी भैरवनाथ ने माता रानी का पीछा नहीं छोड़ा था, तब माता वैष्णो रानी ने महाकाली का रूप धारण किया और भैरव नाथ का संहार कर दिया था।

जब वैष्णो माता ने भैरवनाथ पर प्रहार किया तब भैरवनाथ का सिर कटकर भवन से लगभग 8 किलोमीटर की दूरी पर चित्रकूट पर्वत की भैरव घाटी में जा गिरा था, उस स्थान को भैरव नाथ के मंदिर के नाम से लोग जानते हैं, जब माता रानी ने भैरवनाथ का वध किया था तब उसके पश्चात भैरवनाथ को अपनी गलती का एहसास हुआ था और उसने माता से माफी मांगी थी, माता बहुत दयालु थी उन्होंने भैरवनाथ को माफ कर दिया और उसको यह वरदान दिया था कि जो भक्त मेरे दर्शन करने के लिए आएगा, अगर वह मेरे दर्शन करने के पश्चात तुम्हारे दर्शन करेगा तभी उसकी यात्रा सफल मानी जाएगी, उस भक्त की यात्रा का फल तुम्हारे दर्शन के बाद ही मिलेगा, इसी वजह से आज भी जो भक्त माता वैष्णो के दर्शन करने के लिए जाते हैं वह भैरव नाथ के दर्शन अवश्य करते हैं, इससे उनको अपने दर्शन का पूरा फल मिलता है।

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